मत्तगयंद सवैया (वर्णिक छंद) महक उठीं गलियां बृज की अरु लहक उठीं के कुन्ज लताएं । चहक उठीं कोयल प्यारी बन बांसुरी लै यदुनाथ हैं आए ।।...
मत्तगयंद सवैया (वर्णिक छंद)
महक उठीं गलियां बृज की अरु लहक उठीं के कुन्ज लताएं ।
चहक उठीं कोयल प्यारी बन बांसुरी लै यदुनाथ हैं आए ।।
जमुना भी उमड़ाय पड़ी अरु दहक उठीं सब बृज बालाएं ।
मधुबन से मधुरध्वनि सुन मदमस्त भई सब मधुशालाएं ।।
रज्जन गाइ सुनाइ रहें हरि नाम को छांँड़ि कितै हम जाएं ।।
तुम बिन कौन सहाय करै अब तुम बिन कौन विपतिया टारै ।
हे बृजराज या घोर विपत मा 'रज्जन' तुम्हरी ओर निहारै ॥
विधि को लेख टरै नहि काहु सो जो प्रभु डारै सोइ उबारै ।
रघुपति हाथ कतन्नी बाँवरे पल मॅंह उलट-फेर करि डारै ॥
गणिका, गज, गीध, अजामिल को कैसे तारा हमको भी तारो ।
हौं भवकूप पड़्यौं मै पापी दीना नाथ जो चाहो उबारो ।
तुम बिन कोई हे रघुनन्दन् हम दीनन को नाहि सहारो ।।
रज्जन नाव पड़ी मझधार हे खेवन हार तुम पार उतारो ।।
निशि वासर हरि के चरण महंँ दृग मोतियन को हार चढ़ैहौं ।
जाइ कै बृज गोपियन संँग कुंजन सावरों संँग मैं रास रचैहौं ||
राधे कृष्ण श्री राधेकृष्ण जय राधे कृष्ण को ध्यान लगइहौं ।
बृजरज माथे पे रखि के मैं रज्जन शाम नाम गुन गइहौं ।।
- पंडित रज्जन सरल
महक उठीं गलियां बृज की अरु लहक उठीं के कुन्ज लताएं ।
चहक उठीं कोयल प्यारी बन बांसुरी लै यदुनाथ हैं आए ।।
जमुना भी उमड़ाय पड़ी अरु दहक उठीं सब बृज बालाएं ।
मधुबन से मधुरध्वनि सुन मदमस्त भई सब मधुशालाएं ।।
रज्जन गाइ सुनाइ रहें हरि नाम को छांँड़ि कितै हम जाएं ।।
तुम बिन कौन सहाय करै अब तुम बिन कौन विपतिया टारै ।
हे बृजराज या घोर विपत मा 'रज्जन' तुम्हरी ओर निहारै ॥
विधि को लेख टरै नहि काहु सो जो प्रभु डारै सोइ उबारै ।
रघुपति हाथ कतन्नी बाँवरे पल मॅंह उलट-फेर करि डारै ॥
गणिका, गज, गीध, अजामिल को कैसे तारा हमको भी तारो ।
हौं भवकूप पड़्यौं मै पापी दीना नाथ जो चाहो उबारो ।
तुम बिन कोई हे रघुनन्दन् हम दीनन को नाहि सहारो ।।
रज्जन नाव पड़ी मझधार हे खेवन हार तुम पार उतारो ।।
निशि वासर हरि के चरण महंँ दृग मोतियन को हार चढ़ैहौं ।
जाइ कै बृज गोपियन संँग कुंजन सावरों संँग मैं रास रचैहौं ||
राधे कृष्ण श्री राधेकृष्ण जय राधे कृष्ण को ध्यान लगइहौं ।
बृजरज माथे पे रखि के मैं रज्जन शाम नाम गुन गइहौं ।।
- पंडित रज्जन सरल