हां, मैं नहीं हूं बेघर पर मैंने देखा है सर्द रात में ठिठुरती जिंदा लाशों को देखा है मैंने मृत्यु से भयहीन आंखों को हां, मैं कह सकती ...
हां, मैं नहीं हूं बेघर
पर मैंने देखा है
सर्द रात में ठिठुरती जिंदा लाशों को
देखा है मैंने मृत्यु से भयहीन आंखों को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने समझा है
तपती गर्मी में भूख से व्याकुल क्रंदन को
देखा है आशाहीन आंखों में कुछ बची हुई चमक को
हां, मैं नहीं हूं सत्ता
पर मैंने देखा है
झूठे आदर्शों के ढोंग का मुखौटा पहनी सत्ता को
देखा है मैंने जनता को फुसलाती, मदारी सत्ता को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने समझा है
धर्म, जाति के नाम पर दुश्मन बनी जनता को
देखा है मैंने दंगों में फंसी जनता की पीड़ा को
हां, मैं नहीं हूं जोगी
पर मैंने देखा है
जोगी के वेष में पाखंडी धूर्तों को
देखा है मैंने उनके ढोंग की पराकाष्ठा को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने देखा है अंधभक्ति की सीमा लांघते भक्तों को
देखा है मैंने जालसाजों के जाल में फंसते बेवकूफों को।
हां मैं नहीं साक्ष्य किसी युद्ध की
पर मैंने महसूस किया है
अपनों को खोने के भय को
हां मैं कह सकती हूं
मैंने देखा है आतंक से भयभीत रुदन को
सुना है मैंने बेजुबान चीखों को
देखा है मैंने उनकी आंखों में बसे
स्वच्छंद पंछी बनने के सपने को
हां मैं लोकतंत्र का 'लोक' हूं
समझा है मैंने लोगों के दुख को
सुनी है उनकी असंख्य अधूरी अभिलाषाएं
महसूस किया है उनकी पीड़ा को
देखा है उनकी आंखों में बसे हर स्वप्न को
क्योंकि साहित्य बनाता है संवेदनशील व्यक्ति को।
--गौरी तिवारी
पर मैंने देखा है
सर्द रात में ठिठुरती जिंदा लाशों को
देखा है मैंने मृत्यु से भयहीन आंखों को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने समझा है
तपती गर्मी में भूख से व्याकुल क्रंदन को
देखा है आशाहीन आंखों में कुछ बची हुई चमक को
हां, मैं नहीं हूं सत्ता
पर मैंने देखा है
झूठे आदर्शों के ढोंग का मुखौटा पहनी सत्ता को
देखा है मैंने जनता को फुसलाती, मदारी सत्ता को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने समझा है
धर्म, जाति के नाम पर दुश्मन बनी जनता को
देखा है मैंने दंगों में फंसी जनता की पीड़ा को
हां, मैं नहीं हूं जोगी
पर मैंने देखा है
जोगी के वेष में पाखंडी धूर्तों को
देखा है मैंने उनके ढोंग की पराकाष्ठा को
हां, मैं कह सकती हूं
मैंने देखा है अंधभक्ति की सीमा लांघते भक्तों को
देखा है मैंने जालसाजों के जाल में फंसते बेवकूफों को।
हां मैं नहीं साक्ष्य किसी युद्ध की
पर मैंने महसूस किया है
अपनों को खोने के भय को
हां मैं कह सकती हूं
मैंने देखा है आतंक से भयभीत रुदन को
सुना है मैंने बेजुबान चीखों को
देखा है मैंने उनकी आंखों में बसे
स्वच्छंद पंछी बनने के सपने को
हां मैं लोकतंत्र का 'लोक' हूं
समझा है मैंने लोगों के दुख को
सुनी है उनकी असंख्य अधूरी अभिलाषाएं
महसूस किया है उनकी पीड़ा को
देखा है उनकी आंखों में बसे हर स्वप्न को
क्योंकि साहित्य बनाता है संवेदनशील व्यक्ति को।
--गौरी तिवारी