"मैं कौन हूॅं? अनंत शून्यता का एक निभृत आलाप हूॅं। या किसी संतप्त हृदय का मौन विलाप हूॅं।। मैं कौन हूॅं? विरहिणी के नयनों में अ...
"मैं कौन हूॅं?
अनंत शून्यता का एक निभृत आलाप हूॅं।
या किसी संतप्त हृदय का मौन विलाप हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
विरहिणी के नयनों में अटका अश्रु-कण उदास हूॅं।
किसी योगी की चेतना में स्पंदित चरम विश्वास हूॅं।।
मैं किसी के अधरों पर ठहरी सुकोमल मुस्कान हूॅं।
जो कह न सकी रसना, वही अंतर्मुखी व्याख्यान हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
मैं किसी संकोच में सिमटा हुआ गहरा कुहासा हूॅं।
मैं किसी की तृप्ति हूॅं, मैं ही चिरंतन पिपासा हूॅं।।
मैं चिर-प्रतीक्षित विरह की विवश मूक विभावरी हूॅं।
मैं शून्य-हृदय के अंतस्तल की सुंदर राग आसावरी हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
अनाहत नाद बन गूॅंजता हूॅं अंतर्मन के निश्चय प्रण में।
मैं सूक्ष्म तत्व बन व्याप्त हूॅं इस सृष्टि के कण-कण में।।
मैं न देह हूं, न गेह हूॅं, न मैं काल की संकीर्ण परिधि।
मैं न दूर स्व से कभी, मैं स्वयं विलीन विस्तीर्ण निधि।।
मैं कौन हूॅं?
मैं किसी के मौन का निगूढ़ शाश्वत प्रकटीकरण हूॅं।
मैं स्वयं की खोज में भटके 'स्व' का ही अनुकरण हूॅं।।
भास्कर का ताप भयंकर, भीतर का मैं सत्य हूॅं।
मैं ही भव, मैं ही भूत, मैं ही अलौकिक नित्य हूॅं।।
युग युगांतर में सनातन सत्य परंपरा का श्रेष्ठ गीत हूॅं।
मैं धर्मयुद्ध में जगत नियंता के पार्थ की परम जीत हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
—जितेन्द्र सिंह राणावत,
आभाखेड़ी, भीलवाड़ा (राजस्थान)"
अनंत शून्यता का एक निभृत आलाप हूॅं।
या किसी संतप्त हृदय का मौन विलाप हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
विरहिणी के नयनों में अटका अश्रु-कण उदास हूॅं।
किसी योगी की चेतना में स्पंदित चरम विश्वास हूॅं।।
मैं किसी के अधरों पर ठहरी सुकोमल मुस्कान हूॅं।
जो कह न सकी रसना, वही अंतर्मुखी व्याख्यान हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
मैं किसी संकोच में सिमटा हुआ गहरा कुहासा हूॅं।
मैं किसी की तृप्ति हूॅं, मैं ही चिरंतन पिपासा हूॅं।।
मैं चिर-प्रतीक्षित विरह की विवश मूक विभावरी हूॅं।
मैं शून्य-हृदय के अंतस्तल की सुंदर राग आसावरी हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
अनाहत नाद बन गूॅंजता हूॅं अंतर्मन के निश्चय प्रण में।
मैं सूक्ष्म तत्व बन व्याप्त हूॅं इस सृष्टि के कण-कण में।।
मैं न देह हूं, न गेह हूॅं, न मैं काल की संकीर्ण परिधि।
मैं न दूर स्व से कभी, मैं स्वयं विलीन विस्तीर्ण निधि।।
मैं कौन हूॅं?
मैं किसी के मौन का निगूढ़ शाश्वत प्रकटीकरण हूॅं।
मैं स्वयं की खोज में भटके 'स्व' का ही अनुकरण हूॅं।।
भास्कर का ताप भयंकर, भीतर का मैं सत्य हूॅं।
मैं ही भव, मैं ही भूत, मैं ही अलौकिक नित्य हूॅं।।
युग युगांतर में सनातन सत्य परंपरा का श्रेष्ठ गीत हूॅं।
मैं धर्मयुद्ध में जगत नियंता के पार्थ की परम जीत हूॅं।।
मैं कौन हूॅं?
—जितेन्द्र सिंह राणावत,
आभाखेड़ी, भीलवाड़ा (राजस्थान)"
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