चलों आज हम प्रण कर लें, इतिहास नवल रचने का। स्वर्गीय सूरमा गर्व करें, वो स्थिति प्राप्त करने का। जो सोचेंगे बन जाएँगे, जो बनना है वो...
चलों आज हम प्रण कर लें, इतिहास नवल रचने का।
स्वर्गीय सूरमा गर्व करें, वो स्थिति प्राप्त करने का।
जो सोचेंगे बन जाएँगे, जो बनना है वो सोचें।
एक आखिरी बार वीर हम, आज स्वयं को खोजें।
रक्त नहीं, कलम-शोणित से होंगी तृप्त भवानी,
चलों आज हम बन जाएँ मानवता के सेनानी।
सत्य कहूँ तो यही समय है दूध सफल करने का,
अवसर चूक गया तो प्यारे, घाव नहीं भरने का।
भले कोई न जाने पर, हम खुद पर पछताएँगे,
सौभाग्य मिला जो हमको, उस पर दाग लगा जाएँगे।
यह संदेश अंतःकरण में यदि उतर पाएगा,
केवल चंद दिनों में सारा खेल पलट जाएगा।
जैसे ही अवसर आए, हम सब आँधी बन जाएँ,
एक-एक कर सभी रणों में विजय ध्वजा फहराएँ।
जब तक हृदयों में अपने दुर्जय उत्साह रहेगा,
महाकाल से भी तब तक यह निश्चय नहीं डिगेगा।
अब निश्चिंत रहें गुरुजन और देखें समर तूफानी,
एक-एक दिन रण होगा और होगी अमर जवानी।
शब्दों से उत्साह हृदय-शोणित में जो उतरेगा,
एक प्रश्न न होगा, वीर, जो तुमको व्यथित करेगा।
यदि तुम्हें मैं आज सत्य से अवगत नहीं करूँगा,
होगा यह अपराध मेरा, तो कुछ और रुकूँगा।
आओ छहों शत्रुओं से, हूँ परिचित तुम्हें कराता,
वो सब तो उद्योग थे, ये हूँ जीवन तुम्हें दिखाता।
काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और मत्सर की धारा,
आगे पथ पर चलना है — ये समझदार को इशारा।
लिखी प्रथम यह कविता, इस धरा को समर्पित हो,
करना क्षमा हे प्रिय मुझे, यदि इसमें कोई त्रुटि हो।
-अक्षय सिंह
स्वर्गीय सूरमा गर्व करें, वो स्थिति प्राप्त करने का।
जो सोचेंगे बन जाएँगे, जो बनना है वो सोचें।
एक आखिरी बार वीर हम, आज स्वयं को खोजें।
रक्त नहीं, कलम-शोणित से होंगी तृप्त भवानी,
चलों आज हम बन जाएँ मानवता के सेनानी।
सत्य कहूँ तो यही समय है दूध सफल करने का,
अवसर चूक गया तो प्यारे, घाव नहीं भरने का।
भले कोई न जाने पर, हम खुद पर पछताएँगे,
सौभाग्य मिला जो हमको, उस पर दाग लगा जाएँगे।
यह संदेश अंतःकरण में यदि उतर पाएगा,
केवल चंद दिनों में सारा खेल पलट जाएगा।
जैसे ही अवसर आए, हम सब आँधी बन जाएँ,
एक-एक कर सभी रणों में विजय ध्वजा फहराएँ।
जब तक हृदयों में अपने दुर्जय उत्साह रहेगा,
महाकाल से भी तब तक यह निश्चय नहीं डिगेगा।
अब निश्चिंत रहें गुरुजन और देखें समर तूफानी,
एक-एक दिन रण होगा और होगी अमर जवानी।
शब्दों से उत्साह हृदय-शोणित में जो उतरेगा,
एक प्रश्न न होगा, वीर, जो तुमको व्यथित करेगा।
यदि तुम्हें मैं आज सत्य से अवगत नहीं करूँगा,
होगा यह अपराध मेरा, तो कुछ और रुकूँगा।
आओ छहों शत्रुओं से, हूँ परिचित तुम्हें कराता,
वो सब तो उद्योग थे, ये हूँ जीवन तुम्हें दिखाता।
काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ और मत्सर की धारा,
आगे पथ पर चलना है — ये समझदार को इशारा।
लिखी प्रथम यह कविता, इस धरा को समर्पित हो,
करना क्षमा हे प्रिय मुझे, यदि इसमें कोई त्रुटि हो।
-अक्षय सिंह