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जहां हवा ठहरती थी : Jahan Hawa Thaharti Thi... कहानी

जहां हवा ठहरती थी : Jahan Hawa Thaharti Thi... कहानी

जहां हवा ठहरती थी

जब मुझे लगा कि दुनिया बहुत तेज़ चल रही है और मैं बहुत धीरे, तब मैंने  भागना बंद कर दिया। मेरी उम्र कोई विशेष नहीं, पेशा भी ऐसा नहीं जिसे सुनकर लोग प्रभावित हों। मैं बनारस और इलाहाबाद के बीच की स्मृतियों में पला हुआ, दिल्ली की धूल में काम करता हुआ और भीतर से लगातार किसी अनाम थकान से भरा हुआ आदमी था। लोगों की नज़र में मैं ठीक-ठाक था, पर अपनी नज़र में मैं बिखरा हुआ था।

मुझे लगता था कि मैंने  बहुत कुछ पढ़ लिया है, बहुत कुछ समझ लिया है, बहुत कुछ कह लिया है, लेकिन जो सबसे ज़रूरी था, मैं उससे छूट गया था – “जीवन को चुपचाप देखना” ।

एक दिन मैं अपने पैतृक गाँव गया। गाँव के बाहर, पुराने पोखरे के पास, एक विशाल नीम का पेड़ खड़ा था। वही नीम, जिसके नीचे मेरे बाबा शाम को चौकी डालकर बैठा करते थे। वही नीम, जिसके तने पर बचपन में मैंने  अपनी जेब से निकले कील से "रवि" लिखने की कोशिश की थी।

सालों बाद जब मैं उसके सामने खड़ा हुआ तो मुझे लगा कि समय ने मेरे चेहरे पर बहुत कुछ लिख दिया है, लेकिन उस नीम के पास समय जैसे बैठकर सुस्ता गया हो।उस दिन न जाने क्यों मैंने मन-ही-मन एक संकल्प ले लिया- पूरे एक साल, हर रोज़ , मैं कुछ देर इस नीम के नीचे बैठूँगा।

मुझे नहीं मालूम था कि इससे क्या होगा। मैं किसी ज्ञान की तलाश में नहीं था। मैंने  कोई तपस्या नहीं सोची थी।कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं माँगी थी। मैं केवल थक गया था। मुझे बस थोड़ी-सी शांति चाहिए थी।

**

दिसंबर की ठंडी सुबहें थीं। कोहरे में पोखर गायब हो जाता। नीम के पत्तों से ओस की बूँदें टपकतीं। दूर किसी घर से लकड़ी जलने की गंध आती और मैं  एक पुरानी चादर लपेटे चुपचाप बैठा रहता।

पहले-पहल मुझे बहुत बेचैनी होती। पाँच मिनट बाद ही घड़ी देखने का मन करता। दिमाग में अधूरे कामों की सूची घूमने लगती। पुरानी बातें याद आतीं। भविष्य की चिंताएँ घेर लेतीं।

मैं खुद से पूछता - "मैं यह सब क्यों कर रहा हूँ?"

पर नीम का पेड़ कुछ नहीं कहता। वह हवा के साथ थोड़ा झूमता और फिर स्थिर हो जाता।

जैसे कह रहा हो - "तुम्हें उत्तर नहीं चाहिए, तुम्हें ठहरना सीखना है।"

**

जनवरी में पाला पड़ा।

फरवरी में सरसों पीली हुई।

मार्च की किसी सुबह मैंने  देखा कि नीम की सूखी शाखाओं के बीच बहुत महीन, कोमल हरी पत्तियाँ निकल आई थीं। मुझे लगा जैसे किसी वृद्ध चेहरे पर अचानक बच्चे की मुस्कान खिल उठी हो।

उस दिन मेरे भीतर एक अजीब-सी खुशी हुई। ऐसी खुशी जिसका कोई कारण नहीं था।

उसी शाम मैंने अपनी डायरी में लिखा—"आनंद का कोई कारण नहीं होता। कारण होते ही वह व्यापार बन जाता है।"

वसंत के दिनों में एक गिलहरी रोज़ मेरी बाईं ओर बैठने लगी। पहले वह डरती थी। फिर धीरे-धीरे उसमें मेरी  उपस्थिति से कोई भय नहीं रहा।

एक दिन चींटियों की लंबी कतार मेरे पैरों के ऊपर से गुज़र गई। मैंने  पैर नहीं हटाया। उस दिन पहली बार मुझे लगा कि संसार मेरे लिए नहीं बना है। मैं संसार का स्वामी नहीं हूं। मैं भी बस एक जीव हूं -

गौरैया की तरह। चींटी की तरह। झींगुर की तरह।

और शायद इसी में सबसे बड़ी मुक्ति छिपी हुई थी।

**

बरसात आई। बादल पोखरे में उतर आते। कभी-कभी तेज़ वर्षा में भी मैं छाता लेकर नीम के नीचे बैठा रहता। मेरी माँ हँसतीं—

"पगला गया है लड़का।"

पत्नी, जो अभी भी दिल्ली में रहकर अपनी नौकरी कर रही थी,  कहती—"इतना समय अगर योग में लगाते तो कुछ फायदा भी होता।"

दोस्त मज़ाक करते- "पेड़ से ज्ञान मिल रहा है क्या?"

मैं मुस्कुरा देता। क्योंकि धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा था कि कुछ चीज़ें समझाने के लिए नहीं होतीं। वे बस जीने के लिए होती हैं।

**

एक शाम बारिश के बाद मिट्टी से उठती सोंधी गंध के बीच मैंने  देखा - एक हिरनी अपने बच्चे के साथ पोखरे की ओर आई थी, मैं बता दूं अक्सर हिरणों का झुंड पानी और चारे की तलाश में जंगल छोड़ गांव और खेतों की तरफ निकल आते हैं,

वे दोनों कुछ क्षण रुके। हवा को सूँघा और फिर जंगल की तरफ़ लौट गए।

यह दृश्य मुश्किल से तीस सेकंड का रहा होगा । लेकिन उन तीस सेकंडों में मुझे लगा जैसे पूरी क़ायनात ने अपनी साँस रोक ली हो। उस दिन मैंने अपनी डायरी में लिखा—

"जो सुंदर है, वह रुकता नहीं। वह आता है, छूता है और चला जाता है। शायद इसी से उसका सौंदर्य बना रहता है।"

गर्मी के अंतिम दिनों में अचानक “अबाबीलों” का एक बड़ा झुंड दिखाई दिया। वे आसमान में वृत्त बनाते हुए उड़ रहे थे। अगले दिन वे नहीं थे। जैसे कोई यात्री स्टेशन पर हाथ हिलाकर विदा ले गया हो।

**

सितंबर में पत्तों का रंग बदलने लगा।

अक्टूबर में हवा में उदासी घुल गई।

नवंबर की रातें फिर लंबी होने लगीं।

और इस पूरे समय में मेरे भीतर भी कुछ बदल रहा था। मैं पहले की तरह हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देता था। अब मैं बहसें जीतने में रुचि नहीं रखता था। मैंने  पाया कि बहुत सारे प्रश्न, जिन्हें मैं जीवन-मरण का प्रश्न समझता था, वास्तव में सुबह की धुंध की तरह थे, थोड़ी धूप मिलते ही गायब हो जाने वाले।

एक दिन मैं चलते-चलते फिसल गया। घुटने छिल गए। कुछ देर घास पर पड़ा रहा।उसी क्षण मुझे वर्षों पहले देखी अन्द्रेई तारकोव्स्की की फिल्म 'मिरर'  का एक संवाद याद आ गया –

"मैं गिर पड़ा और अचानक मैंने कुछ बहुत ही उल्लेखनीय चीज़ें पाईं। झाड़ियाँ, सूखे पत्ते और घासें। मैंने पाया इनमें से कोई भी उलझन में न था, न किसी संशय से भरा था, कोई भी अलग-थलग नहीं था - मेरी तरह।"

घास मेरे घावों से बेपरवाह थी। हवा अपनी गति में थी। एक तितली पास बैठकर फिर उड़ गई और मुझे अचानक हँसी आ गई। कितना बड़ा भ्रम था मुझे कि ये दुनिया मेरी चिंताओं और परेशानियों के चलते रुक जायेगी ।

संसार तो मेरे पहले भी था। मेरे बाद भी रहेगा और यह जानकर पहली बार मुझे दुख नहीं, बल्कि गहरा सुकून मिला।

**

धीरे-धीरे मेरे भीतर का "मैं" छोटा होने लगा। अब मुझे अपने बारे में बहुत कम सोचना पड़ता था। मुझे लगने लगा कि जो चेतना

मेरी आँखों में झाँकती है, वही किसी कौवे की आँखों में भी चमकती है।

वही पोखर के पानी में है। वही नीम की जड़ों में है।

वही शाम के आकाश में फैले लाल रंग में है।

भेद तो हैं, पर अलगाव नहीं। जैसे एक ही नदी अनेक लहरों का रूप धारण कर ले।

मुझे अद्वैत का अर्थ किसी पुस्तक से नहीं, एक पेड़ की छाया से समझ में आने लगा।

**

तीन सौ पैंसठवाँ दिन आया। सूरज ढल रहा था। दूर मंदिर से आरती की आवाज़ आ रही थी। गाँव के बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे।

पोखरे में बत्तखें उतर रही थीं।

मैं  अपने साथ एक पुरानी बाँसुरी लेकर आया था, जो मेरे बाबा की थी। मैं नीम के तने से टिककर बैठा और बहुत देर तक कोई अधूरा-सा राग बजाता रहा।

न कोई श्रोता था। न कोई पुरस्कार। न कोई उपलब्धि।

बस हवा थी। पत्तों की सरसराहट थी और वो विशाल नीम था, जिसने पूरे एक वर्ष मुझसे कुछ भी नहीं माँगा था, लेकिन मुझे बहुत कुछ दे दिया था।

मैंने धीरे से तने पर हाथ रखा और पहली बार मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी पेड़ को छू रहा हूं ।

मुझे लगा, जैसे मैंने किसी पुराने मित्र का हाथ पकड़ रखा हो। मेरी आँखें बंद हो गईं। भीतर से एक वाक्य उठा-

"प्रकृति कभी उपदेश नहीं देती।वह केवल उपस्थित रहती है। और कभी-कभी, केवल किसी की उपस्थिति ही सबसे बड़ी कृपा होती है।"

नीम चुप था। जैसा वह सदियों से था पर उस मौन में एक गहरी आत्मीयता थी और मैंने जाना - जीवन को समझना, शायद जीवन को जीतना नहीं है। जीवन को समझना, उसके साथ बैठना है। उसी तरह जैसे शाम के समय कोई बूढ़ी दादी बरामदे में बैठी रहती है – किसी से कुछ कहे बिना पर सब कुछ कहती हुई।

उस रात जब मैं घर लौटा तो अपनी डायरी के अंतिम पन्ने पर केवल एक पंक्ति लिखी -

"मैं ज्ञान लेकर नहीं लौटा हूँ। मैं थोड़ा कम 'मैं' होकर लौटा हूँ  और यह भी लिखा कि कभी-कभी, किसी का चुपचाप साथ बने रहना ही सबसे बड़ा उपदेश होता है।"

 

रविकांत राऊत

जबलपुर मध्यप्रदेश


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