चार दिन : Four days ... कहानी
चार दिन....
अलसाई दोपहरी में जामुन घूमता
रहा। जहां तहां काम की तलाश में होली चौक सूना था शायद वह भी सो रहा था जैसे शहर
खिड़की बंद कर सो रहा था थकी शाम की प्रतीक्षा में।
जामुन होली चौक के बीमार पेड़
के पास बैठा इस चाह में की वह उसे कोई इलाज बताएगा बहरहाल, कत्थई कुर्ते सफेद पजामे में अधेड़ आदमी आता दीख पड़ा। आदमी ने बीमार
पेड़ से चिपके जामुन से कहा
घर की पुताई का कितना लेते हो ?
जामुन आंखे मलते हुए उठा।
चकित सा बोला
क्या....?
घर की पुताई का कितना लेते हो ?
वैसे पुताई आधी हुई है उस हरामजादे
की बीवी बिया गई।
तरह तरह की गालियों से किसी को याद
कर वह आगे बोला
तुम कितना लोगे ?
देखो 200 गज घर है लगभग आधा हो
चुका है आधा ही करना है।
2 3 दिन में हो जाएगा।
जामुन कुछ कह पाता कि उस आदमी
ने 250 रुपए दिहाड़ी जमा दी खैर...जामुन मन ही मन सोच रहा था इस पेड़ को अपनी कथा
तो नहीं कही थी शायद इसने मेरी सूरत देख रोग का पता लगा लिया होगा।
जामुन उसके साथ साथ चलता गया अधेड़
आदमी जामुन को बोलता सुनाई पड़ा जामुन को लगा शायद वह उसे ही बक रहा है।
चौथे दिन दिवाली है 2 3 दिन में
पुताई का सब काम हो जाना चाहिए।
घर महंगे सामानों से भरा पड़ा
है चीजें इधर उधर बिखरी पड़ी हैं जरा सही से कहीं पेंट न गिरे
और जामुन को सभी दिशा निर्देशों
से लैस किया जाता रहा।
अधेड़ आदमी कैंची वाली गली से
दाएं होते घर पहुंचा।
घर की घंटी भी दोपहर में सो गई
थी या वह जामुन को नया आदमी समझ गाने में शर्मा रही थी।
मगर चौथी बार घंटी इतनी तेज
दबाई गई की वह चीख उठी तब जामुन को मालूम हुआ उस घंटी का घर के प्रति क्या दायित्व
है।
भीतर से एक महिला ने दरवाजा
खोला जो शायद अधेड़ आदमी की पत्नी रही हो
अधेड़ आदमी भीतर गया जामुन पीछे
पीछे हो लिया।
भीतर जाते ही अधेड़ ने सब काम
बता डाला कहां पेंट होगा किस दीवार पर कैसा रंग जमेगा।
शायद यह जामुन के पेंट करने का
पहला अनुभव था लेकिन अधेड़ आदमी और उसकी पत्नी के सामने उसने ऐसे सिर हिलाया की यह
मान लिया गया जामुन पेंट करने में पेशेवर रहा है।
जामुन को पेंट की बाल्टी ब्रुश
पकड़ा दिए गए और दिशा निर्देशों से लैस कर दिया गया कहां पेंट करना है।
जामुन ने निर्देशों के अनुसार
वैसा ही पेंट करा ग्रहणी ने शाम होने पर घी के 5 बड़े दीपक जला दिए जिन्हें
दरवाजों और कमरों में रखा गया जिससे कमरों और दरवाजों को अकेलापन न खटके और बाकी
तेल में तैरते छोटे दीपक घर में लगाए गए।
ऊपर की दीवार को गुलाबी रंग से
पेंट कर जामुन बरामदे में आया
“मालिक पेंट हो गया है मैं
जाऊं...?
हां हां भई ठहरो दिहाड़ी लिए
बिना ही चले जाओगे...?
मालिक...
लो भई 250
अच्छा मालिक” कह जामुन मुड़ा
अधेड़ की मजबूत आवाज उसके कानों के पार निकल गई
“कल जरा जल्दी आना”
“जी मालिक”
जामुन घर से बाहर को हुआ
कैंची वाली गली आज चमक रही थी।
जामुन तेज तेज कदम बढ़ा कर घर
पहुंचा। घर में एक डिबिया जल रही थी जो जामुन को देख कुछ मुस्कुरा दी
संतोषी ने पति को आते देख उठते हुए
बोली
“शीला अपने बाबा को एक गिलास
पानी तो दे”
जामुन वहीं बैठ गया शीला ने
पानी पकड़ा दिया जामुन 2 3 सांस में पानी पूरा पी गया और शीला को अपनी गोद में
बिठा लिया
संतोषी पास आ बोली आज कुछ काम
मिला ?
“हां एक साहब के घर पेंट करने
चला गया था 250 रुपए मिल गए”
“लेकिन तुम तो पेंट कभी नहीं
करे हो फिर अपने घर में मैयत रंगने किसने दे दिया ?
“हां वो जल्दी में बोल पड़ा तो
मैंने हां में सर हिला दिया”
खैर... शीला और तूने खाना
खाया...?
“घर में गैस खतम हो गई शीला को
सत्तू खिला दिया”
जामुन को याद आया छोटा सिलेंडर
2 दिन में खत्म हो जाता है
उसने जेब में हाथ डाला और
सिलेंडर उठा बाहर चलता बना
पीछे से संतोषी चिल्लाई “दाल भी
खतम है आधा पाव दाल और कुछ चावल लेते आना”
शीला भी जामुन के पीछे दौड़ी
लेकिन जामुन इतनी जल्दी में निकला कहीं दिखाई नहीं दिया शीला उदास मुंह लिए वापस
दरी पर आ लेट गई।
जामुन गैस की दुकान पर पहुंचा
और काउंटर पर सिलेंडर पटक दिया
कितना...?
“100 रुपए की डाल दो भाई
100 में क्या आएगा ?
अरे भाई जो भी आए”
दुकानदार ने जामुन की शक्ल देखी
फिर गैस भरने लगा।
2 मिनट बाद ही पाइप निकाल दिया
और जामुन ने पैसे दिए और सिलेंडर ले खंडेल परचूनी पर पहुंच गया।
लोग राशन लेने के बाद चावल
परचूनी पर बेच जाते थे इसी कारण लाला राशन वाले चावल सामान्य चावलों से कम
दाम में दिया करता था। जामुन ने 15 रुपए के राशन वाले चावल लिए और 15 की अरहर । लगभग 130 रुपए की खरीददारी कर जामुन घर पहुंचा
सिलेंडर और चावल, दाल रख जामुन मुंह हाथ धोने नल के पास चला गया।
शीला पीछे से भागती हुई नल से
दूर जरा सिल्ली के पास तक आई जामुन ने देखते ही शीला को गोद
में उठा लिया।
शीला ने जामुन की गोद में आते
उसकी जेब के तीन लटकते धागे हटा इमली,चूरन के लड्डू की पड़ताल शुरू की परिणाम
स्वरूप उसे 1 आटे की पीली बर्फी और चांद सितारे का पैकेट मिला।
शीला ने जामुन के सवालों से
पहले अपने दिन भर का सब हाल कह सुनाया और उन खेलों का परिचय दिया जिन्हें हाल में
ही गली के किसी कोने में किसी खिचड़ी बालों वाले बाल वैज्ञानिक ने खोजा था।
लगभग आधे घंटे बाद सब ने खाना
खाया शीला कुछ पहले सो गई थी और जामुन के उठाने पर उसकी गोद में सो गई।
बहरहाल... अगले दिन जामुन करीब
9 बजे अधेड़ के घर पहुंचा। तब अधेड़ ने कुछ नई गालियों और बेहद सम्मानजनक शब्दों
से जामुन का स्वागत किया। समय का पक्का होने के कारण जामुन से नाश्ते के लिए कहना
ठीक नहीं समझा गया और शायद इसीलिए भी नहीं कहा गया क्योंकि इससे जामुन को अपना काम
करने में परेशानी होगी और वह घर देर से पहुंचेगा।
जामुन ने अपना काम शुरू किया आज
जामुन को सीढ़ियों के ठीक ऊपर का बाजू वाला कमरा रंगना था। वह जल्दी से लाल रंग और
फेविकोल का घोल तैयार कर ऊपर गया। कमरा बिखरा था और सभी सामान अस्त व्यस्त था। खैर
उसने अपने काम का जय गणेश यहीं से प्रारंभ किया उसे यही सही मुहूर्त लगा और चूंकि
वह सम्मान जनक शब्दों से तंग आ गया था उसका सम्मान लेने का मन भर चुका था। जामुन
अपने काम में इतना समर्पित दिख रहा था कि दोपहर हो जाने पर भी किसी को उससे खाने
के लिए पूछना उसके काम के प्रति अपराध बोध मालूम हो रहा था। लेकिन जामुन ने ये
अपराध तब किया जब उसे खिड़की से सूरज की किरणें अपराध करके जाती हुई मालूम पड़ी।
जामुन सीढ़ियों से नीचे आया तब उसे किसी का कोकिल स्वर सुनाई दे रहा था और ऐसा
इसलिए हुआ क्योंकि उसने अपने चरण कमलों से सीढ़ियां रंग दी थी।
खैर... अधेड़ व्यक्ति रसोई के
बाजू वाले कमरे से बाहर निकला और ऊपर देखते हुए उसने अपना पान से भरा मुंह खोला।
भई... एक नंबर
दिहाड़ी 10 है मगर काम एक नंबर
है।
महिला ने अपनी साड़ी कसते हुए
कहा
हां एक नंबर लेकिन सीढ़ियों पर
दो नंबर काम भी किया है।
अधेड़ ने सीढ़ियों को देखा और
जामुन को देखा फिर बोला भई तुमने बढ़िया काम किया है।
जामुन मुट्ठी भींचे मुस्कुरा
दिया।
अधेड़ जामुन को खींचते हुए पास
पड़ी कुर्सी पर ले गया और सुनीता नाम चिल्लाने लगा। वही स्त्री रसोई से बाहर आई
जिसने जामुन के चरण कमलों के चिन्हों को 2 नंबर की उपाधि से सुशोभित किया था।
अधेड़ ने 2 चाय और कुछ खाना
लाने का इशारा किया। थोड़ी देर में जामुन के सामने चाय, नमकपारे और सफेद रसगुल्ला
लाया गया। जामुन ने नाश्ता खत्म कर जल्दी से चप्पल पहनी और 250 रुपए लेकर कैंची
वाली गली को चलता बना।
आज धनतेरस के शुभ अवसर पर उसे
घर में उबले चावल और छौंक लगी दाल का पकवान मिल गया। शीला भी आज फटी फ्रॉक पहने थी
जिसके लटके धागे कोई नए फैशन की ओर इशारा कर रहे थे। शीला को देखते जामुन ने रोज
की तरह गोद में उठा लिया। और शीला भी रोज की तरह उसके जेब से लटके धागे हटा कुछ
ढूंढने लगी। संतोषी ने हस्ते हुए बताया आंगनवाड़ी में शीला का दाखिला हो गया है
जिसके फल स्वरूप आज शीला को खाने को मीठा दलिया, पीली मटर और लिखने को स्लेट और
काली फट्टी मिली है। जामुन ने अपनी काली स्लेटी पैंट जो कि स्लेटी ही थी मगर न
धुलने से काले के मिश्रण से काली हो गई थी कि जेब से इमली के 2 लड्डू निकाले और
शीला को दे दिए। सभी ने उस रात रोज से थोड़ा ज्यादा खाना खाया।
अगली सुबह जामुन तड़के ही अधेड़
के घर पहुंच गया यह देख अधेड़ खुश हुआ और सुनीता ने बातें बनाना शुरू किया।
“आज आप काम कराइए कल तो इसने 2
नंबर का काम किया है
अधेड़ हंसते हंसते
कहता रहा आज में साथ ही काम कराऊंगा”
दोपहर को जामुन ने बरामदे में
खाना खाया और शाम होते तक सारा घर रंग चुका था। और अब जामुन खुशी और चिंता से लैस
घर जाने को तैयार था। वह खुश था काम हो गया है और चिंता थी कि परसों से कोई काम
मिलेगा या नहीं।
बहरहाल अधेड़ ने शाम को जामुन
को सफेद रसगुल्ले खिलाते हुए कहा
भई आज की दिहाड़ी कल आकर ले
लेना।
जिसपर जामुन कुछ कहना चाहता था
फिर जी बोल ककैंची वाली गली को चल दिया।
घर पहुंच कर मालूम हुआ गैस,
दाल, चावल खत्म हो चुके हैं।
उसने अधेड़ के लिए अपना गुस्सा
निकाला मगर संतोषी ने उसे ये कहते हुए चुप करा दिया कि “रात ही तो
निकालनी है सत्तू खा लेंगे सुबह तो पैसे आ ही जानी है।”
आज शीला भी समय से पहले सो गई
थी जामुन और संतोषी कल का सोच कर सो गए।
सुबह करीब 10 बजे जामुन अधेड़
के यहां इसलिए गया ताकि अधेड़ को यह न लगे जामुन पैसे लेने जल्दी आ गया है।
खैर 10 बजे मालूम हुआ अधेड़ घर
नहीं था जामुन कुछ देर इधर उधर टहलता रहा बीच बीच में घर आकर अधेड़ को पूछता रहा।
दोपहर तक यह प्रक्रिया यूहीं
चलती रही आखिर करीब 3 बजे अधेड़ घर में मिला। घर में कई मेहमानों का आना जाना लगा
हुआ था और कई मिठाई के डिब्बे दिखाई दे रहे थे। इन सब में अधेड़ ऐसा व्यस्त मालूम
पड़ रहा था कि उसका मिलना मुश्किल है।
शाम होते तक जामुन बीच बीच में
आकर देखता रहा इस उम्मीद से की अधेड़ उसे देख लेगा अंततः घरों के बाहर बल्ब की
लड़ियां चमकने लगी तब जामुन से नहीं रहा गया और वह अधेड़ के बरामदे तक पहुंच गया।
अधेड़ उसे देखते ही एक ओर को ले
गया और कहने लगा
“अरे भई तुम अब आए हो...
मैं तो सुबह से तुमको देख रहा
था”
जामुन कुछ कह पाता कि उसने
सुनीता सुनीता की आवाज लगाई....
अरे सुनीता वो मिठाई का डब्बा
जो सुबह निकाला था और छोटे वाले कमरे में मेज़ पर कुछ कपड़े रखें हैं वो इधर पकड़ा
देना जरा।
सुनीता अपने अस्त व्यस्त बालों
को संभालते और यह बकते हुए आई सब ध्यान इन लोगों पर लगा रखा है। सुधा दामाद के साथ
आने को है भई जरा दरवाजे पर ध्यान दे लो।
हां हां तुम्हारी बेटी खुद कार
उड़ा के लाती है अब वो लोग जल्दी आ जाएं तो इसमें हम क्या कर सकते हैं। अधेड़
बोला...।
यह भी अब आया है पहले निपटा लें
इसे।
सुनीता अंदर घर में चली गई
अधेड़ ने एक कपड़े का थैला,
मिठाई का डब्बा, उसके ऊपर कुल 550 रुपए रख के जामुन को दिए।
“भई होली चौक मिल जाना बढ़िया
काम किए हो आगे और भी तुमसे करवाएंगे” अधेड़ ने जामुन से कहा
जामुन “जी मालिक”
कह कैंची वाली गली को तेजी से कदम बढ़ाते हुए निकला।
मगर दीवाली की रात पुलिस
प्रशासन ने छोटी गलियां बंद कर रखी थी जिस कारण आज जामुन को चौड़ी सड़क से जाना
था।
जाते हुए जामुन खुश था और सोच
कर रहा था आज 2 किलो गैस और एक किलो चावल या उससे कुछ ज्यादा मिल जाएंगे।
जामुन सड़क के कोने से थोड़ा
बीच में हुआ क्योंकि कोने की सड़क पर गड्ढे थे और सड़क अंधेरी थी।
जामुन के हाथ में सामान कुछ ऐसा
लग रहा था जैसे मैदान फतह कर, जामुन मुकुट
लेकर लौट रहा हो।
जामुन के पीछे से एक उजाला
दिखलाई पड़ा और जामुन के पीछे देखते एक काली कार तेजी से धक्का मार कर चली गई।
जामुन वहीं अधेड़ मुंह गिरा पड़ा रहा। लोगों की भीड़ उसके आस पास लग गई लेकिन लोग
उसे दैवीय घटना समझ छूने या ज्यादा पास आने से डर रहे थे और जैसा कि हर दैवीय घटना
खुद शांत होती है यहां भी लोग यही सोच कर दूर जाते रहे कि दीवाली पर दैवीय घटना
हुई है हवा सी आती काली गाड़ी गरीब को छू कर निकल गई है।
हां लोग यह बात जरूर कर रहे थे “गाड़ी
के पिछले शीशे पर सुधा अरोड़ा लिखा है”
यह जरूर अरोड़ा जी की बेटी की
कार है जो कैंची वाली गली के दूसरे छोर पर अपने घर मिलने जा रही होगी।
- रिषव
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