यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थाप...
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब समाज में 'धर्म' (न्याय, व्यवस्था और सत्य) की हानि होती है और 'अधर्म' (अन्याय और अत्याचार) बढ़ता है, अर्थात् न्याय व्यवस्था की हानि होती है तब वे अवतार लेते है वे अपनी शक्ति का उपयोग कमजोर व्यक्तियों को न्याय दिलाने के लिए करते हैं। और दुष्टों का विनाश करने के लिए करते हैं।
भारतीय संस्कृति में न्याय को 'धर्म' और शक्ति को 'दंड' या 'बल' कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं शक्ति के वास्तविक उद्देश्य को परिभाषित किया है। उन्होंने साफ कहा है कि जब भी न्याय (धर्म) खतरे में पड़ता है, तब शक्ति का अवतरण अनिवार्य हो जाता है।
किसी भी राजा, सरकार या राज्य की 'शक्ति' का पहला और सबसे पवित्र कर्तव्य अथवा न्याय यही है कि वह समाज के सीधे और सच्चे लोगों (साधुओं) को सुरक्षा प्रदान करे, ताकि उन्हें किसी अत्याचारी का डर न रहे।
न्याय का अर्थ है निष्पक्षता, सच्चाई और समानता। यह एक ऐसी नैतिक और कानूनी व्यवस्था है जो समाज में हर व्यक्ति को उसका हक दिलाती है।न्याय समाज का 'विवेक' और 'आत्मा' है। यह वह तराजू है जो समाज में संतुलन बनाए रखता है।
शक्ति वह क्षमता, बल या प्रभाव है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति या संस्था अपनी इच्छा दूसरों पर लागू करवा सकती है। शक्ति समाज की 'ऊर्जा' और 'भुजाएं' हैं। इसके बिना समाज में कोई भी व्यवस्था, नियम या ढांचा खड़ा नहीं रह सकता और न ही न्याय को सुरक्षित रखा जा सकता है।
बिना शक्ति के न्याय केवल एक खोखला आदर्श या नैतिक उपदेश बनकर रह जाता है। न्याय को स्थापित करने के लिए शक्ति की आवश्यकता विशेष रूप से होती है जिसे न्याय की व्यवस्था बनाए रखना कमजोरों को न्याय दिलवाना किसी भी नियम को लागू करना समाज की अराजकता को रोकना समाज में व्यवस्था बनाए रखना ये सभी कार्य न्यायप्रणाली के हैं जिन्हे बिना शक्ति के लागू नहीं किया जा सकता।
शक्ति का मूल कर्तव्य ही यही है कि वह समाज के निर्दोष और न्यायप्रिय लोगों की रक्षा करे और अन्याय करने वालों का दमन करे। बिना न्याय की स्थापना के, शक्ति केवल विनाश का कारण बनती है।
जिस तरह न्याय के लिए शक्ति की आवश्यकता है, उसी तरह बिना न्याय के शक्ति एक विनाशकारी रूप में स्थापित हो जाती है शक्ति के कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए न्याय की व्यवस्था अति आवश्यक है।
जैसे शक्ति अगर अत्याचार में परिवर्तित हो जाए तो उस पर अंकुश लगाने के लिए न्याय प्रणाली की आवश्यकता होती है। कोई भी शासन प्रणाली चलाने के लिए केवल शक्ति ही नहीं, न्याय की व्यवस्था भी समान रूप से ही होती है। न्यायपूर्ण शक्ति ही लोगों में विश्वास है पैदा करती है की न्याय निष्पक्ष है। शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्याय की व्यवस्था करना एक आवश्यक कार्य है।
न्याय और शक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। न्याय समाज का 'मस्तिष्क' और 'आत्मा' है, तो शक्ति उसके 'हाथ' और 'पैर' हैं। यदि मस्तिष्क काम न करे तो हाथ-पैर विनाश फैलाएंगे, और यदि हाथ-पैर ही न हों तो मस्तिष्क की सोच धरी की धरी रह जाएगी।
न्याय व शक्ति के संबंध को दर्शाते हुए एक विख्यात दार्शनिक ने कहा है:-""बिना शक्ति के न्याय असहाय है, और बिना न्याय के शक्ति अत्याचारी है।""
न्याय व शक्ति ये दोनों तत्व किसी भी संगठित समाज और राज्य के आधार स्तंभ हैं। इनके संतुलन पर ही समाज की शांति, प्रगति और स्थिरता निर्भर करती है।
"
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब समाज में 'धर्म' (न्याय, व्यवस्था और सत्य) की हानि होती है और 'अधर्म' (अन्याय और अत्याचार) बढ़ता है, अर्थात् न्याय व्यवस्था की हानि होती है तब वे अवतार लेते है वे अपनी शक्ति का उपयोग कमजोर व्यक्तियों को न्याय दिलाने के लिए करते हैं। और दुष्टों का विनाश करने के लिए करते हैं।
भारतीय संस्कृति में न्याय को 'धर्म' और शक्ति को 'दंड' या 'बल' कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं शक्ति के वास्तविक उद्देश्य को परिभाषित किया है। उन्होंने साफ कहा है कि जब भी न्याय (धर्म) खतरे में पड़ता है, तब शक्ति का अवतरण अनिवार्य हो जाता है।
किसी भी राजा, सरकार या राज्य की 'शक्ति' का पहला और सबसे पवित्र कर्तव्य अथवा न्याय यही है कि वह समाज के सीधे और सच्चे लोगों (साधुओं) को सुरक्षा प्रदान करे, ताकि उन्हें किसी अत्याचारी का डर न रहे।
न्याय का अर्थ है निष्पक्षता, सच्चाई और समानता। यह एक ऐसी नैतिक और कानूनी व्यवस्था है जो समाज में हर व्यक्ति को उसका हक दिलाती है।न्याय समाज का 'विवेक' और 'आत्मा' है। यह वह तराजू है जो समाज में संतुलन बनाए रखता है।
शक्ति वह क्षमता, बल या प्रभाव है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति या संस्था अपनी इच्छा दूसरों पर लागू करवा सकती है। शक्ति समाज की 'ऊर्जा' और 'भुजाएं' हैं। इसके बिना समाज में कोई भी व्यवस्था, नियम या ढांचा खड़ा नहीं रह सकता और न ही न्याय को सुरक्षित रखा जा सकता है।
बिना शक्ति के न्याय केवल एक खोखला आदर्श या नैतिक उपदेश बनकर रह जाता है। न्याय को स्थापित करने के लिए शक्ति की आवश्यकता विशेष रूप से होती है जिसे न्याय की व्यवस्था बनाए रखना कमजोरों को न्याय दिलवाना किसी भी नियम को लागू करना समाज की अराजकता को रोकना समाज में व्यवस्था बनाए रखना ये सभी कार्य न्यायप्रणाली के हैं जिन्हे बिना शक्ति के लागू नहीं किया जा सकता।
शक्ति का मूल कर्तव्य ही यही है कि वह समाज के निर्दोष और न्यायप्रिय लोगों की रक्षा करे और अन्याय करने वालों का दमन करे। बिना न्याय की स्थापना के, शक्ति केवल विनाश का कारण बनती है।
जिस तरह न्याय के लिए शक्ति की आवश्यकता है, उसी तरह बिना न्याय के शक्ति एक विनाशकारी रूप में स्थापित हो जाती है शक्ति के कार्यों पर अंकुश लगाने के लिए न्याय की व्यवस्था अति आवश्यक है।
जैसे शक्ति अगर अत्याचार में परिवर्तित हो जाए तो उस पर अंकुश लगाने के लिए न्याय प्रणाली की आवश्यकता होती है। कोई भी शासन प्रणाली चलाने के लिए केवल शक्ति ही नहीं, न्याय की व्यवस्था भी समान रूप से ही होती है। न्यायपूर्ण शक्ति ही लोगों में विश्वास है पैदा करती है की न्याय निष्पक्ष है। शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्याय की व्यवस्था करना एक आवश्यक कार्य है।
न्याय और शक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। न्याय समाज का 'मस्तिष्क' और 'आत्मा' है, तो शक्ति उसके 'हाथ' और 'पैर' हैं। यदि मस्तिष्क काम न करे तो हाथ-पैर विनाश फैलाएंगे, और यदि हाथ-पैर ही न हों तो मस्तिष्क की सोच धरी की धरी रह जाएगी।
न्याय व शक्ति के संबंध को दर्शाते हुए एक विख्यात दार्शनिक ने कहा है:-""बिना शक्ति के न्याय असहाय है, और बिना न्याय के शक्ति अत्याचारी है।""
न्याय व शक्ति ये दोनों तत्व किसी भी संगठित समाज और राज्य के आधार स्तंभ हैं। इनके संतुलन पर ही समाज की शांति, प्रगति और स्थिरता निर्भर करती है।
"