बना चूतिया लूटते, सबको नीम हकीम। काले को गोरा करें,बेंच रहे हैं क्रीम।। गंजे के सिर पे नहीं, उगते फिर से बाल। किन्तु दवा को बेच सब,क...
बना चूतिया लूटते, सबको नीम हकीम।
काले को गोरा करें,बेंच रहे हैं क्रीम।।
गंजे के सिर पे नहीं, उगते फिर से बाल।
किन्तु दवा को बेच सब,काट रहे हैं माल।।
बिना रोग की जाँच के, करते हैं उपचार।
सबसे लेते वैद्य जी, पैसे दो के चार।।
सुई लगाते काँपते,जोर-जोर से हाथ।
चोट पैर में है लगी, पकड़ देखते माथ।।
पकड़ न पाते हैं कभी, कोई रोग सटीक।
इनकी खा करके दवा, मर्ज न होती ठीक।।
कहते खुद को वैद्य हैं,तनिक नहीं पर ज्ञान।
रोगग्रस्त को लूटना, समझें अपनी शान।।
भूल गए निज आचरण, भूले अपना धर्म।
रोगी को नित लूटते,आती तनिक न शर्म।।
दस की यदि होती दवा, लेते दुगुना दाम।
धन दौलत के लोभ में, करते गंदे काम।।
सेवा की तज भावना, करते हैं व्यापार।
बस पैसा ही रह गया, जीवन का आधार।।
रोग ग्रसित नर को डरा, खूब रहे धन लूट।
कहते हैं उपचार में, देते हैं हम छूट।।
इनको जनता मानती, है अपना भगवान।
पर यह धन के लोभ में,ले लेते नर जान।।
रोगी अपने वैद्य पर,करता है विश्वास।
तभी मिटाने पीर तन,जाता इनके पास।।
छोटी सी भी गाँठ यदि, निकाल हरते पीर।
रोगी दुगुना दाम ले, देते बना फकीर।।
मची लूट है हर तरफ,रोगी हैं बेहाल।
रोगी का धन लूट कर,सब हैं वैद्य निहाल।।
सबसे भारी हो गया,रोगी का उपचार।
मगर ध्यान देती नहीं,इस पर कुछ सरकार।।
-- राम जी तिवारी"राम"
काले को गोरा करें,बेंच रहे हैं क्रीम।।
गंजे के सिर पे नहीं, उगते फिर से बाल।
किन्तु दवा को बेच सब,काट रहे हैं माल।।
बिना रोग की जाँच के, करते हैं उपचार।
सबसे लेते वैद्य जी, पैसे दो के चार।।
सुई लगाते काँपते,जोर-जोर से हाथ।
चोट पैर में है लगी, पकड़ देखते माथ।।
पकड़ न पाते हैं कभी, कोई रोग सटीक।
इनकी खा करके दवा, मर्ज न होती ठीक।।
कहते खुद को वैद्य हैं,तनिक नहीं पर ज्ञान।
रोगग्रस्त को लूटना, समझें अपनी शान।।
भूल गए निज आचरण, भूले अपना धर्म।
रोगी को नित लूटते,आती तनिक न शर्म।।
दस की यदि होती दवा, लेते दुगुना दाम।
धन दौलत के लोभ में, करते गंदे काम।।
सेवा की तज भावना, करते हैं व्यापार।
बस पैसा ही रह गया, जीवन का आधार।।
रोग ग्रसित नर को डरा, खूब रहे धन लूट।
कहते हैं उपचार में, देते हैं हम छूट।।
इनको जनता मानती, है अपना भगवान।
पर यह धन के लोभ में,ले लेते नर जान।।
रोगी अपने वैद्य पर,करता है विश्वास।
तभी मिटाने पीर तन,जाता इनके पास।।
छोटी सी भी गाँठ यदि, निकाल हरते पीर।
रोगी दुगुना दाम ले, देते बना फकीर।।
मची लूट है हर तरफ,रोगी हैं बेहाल।
रोगी का धन लूट कर,सब हैं वैद्य निहाल।।
सबसे भारी हो गया,रोगी का उपचार।
मगर ध्यान देती नहीं,इस पर कुछ सरकार।।
-- राम जी तिवारी"राम"